Sunday, December 6, 2009

Areee Ye Kya Ho Rahaaa Hai...........



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Sunday, November 8, 2009

ये कैसा शिक्षा का मन्दिर ??????????

हाँ कुछ ऐसा ही कहना चाहता हूँ आपका दोस्त में अनुज शर्मा "Pndit" (जर्नलिस्ट)

दरसल में बात कर रहा हूँ डॉ। भीम राव आंबेडकर विश्वविध्यालय {आगरा } के बारे में जहाँ शुक्रवर को बहा बेकसूर स्टूडेंट्स का खून जिनमे शामिल थी लड़कियां भी। यूनिवर्सिटी के बेकाबू कर्मचारियों ने मानवीयता के हर हद को तोड़ कर स्टुडेंटस को यूनिवर्सिटी कैम्पस में दोडा- दोडा कर लाठी डंडो से जम कर पीटाऔर ये मर पिट जब तक जरी रही जब तक की स्टूडेंट्स बेहोश हो कर गिर पड़े और खून से लथपथ हो गए।
यहाँ गौर तलब हे की कर्मचारियों ने गर्ल्स स्टूडेंट्स के साथ हर हद को पर कर अभद्रता की तथा उन्हें भी नही बक्स्खा गया तथा वहां मोजूद पोलिशकर्मी और विश्वविध्यालय प्रशासन के आला अधिकारी सिर्फ़ मूक दर्शक बने देखते रहे।
और स्टूडेंट्स पिटते रहे जो सिर्फ़ अपने जायज प्रोब्लमस को लेकर विश्वविध्यालय आये थे और उन्हें वहां मिले तो डंडो के साथ लात - घुन्शे के साथ अभद्रता। और जब स्टूडेंट्स पिट रहे तो वहां विश्वविध्यालय के उप कुलसचिव बाल जी यादव जी चुप खडे संवेदनाओ का नंगा नाच देख रहे थे क्यूँ कि उन्हें तो इस सबमे बड़ा मजा रहा था , शायद इस बर्बरता पूर्ण घटना को देख कर आगे से कोई भी स्टुडेंट अपने समस्याओ को लेकर आगरा विश्वविध्यालय का रुख ना करे
अब आप जरा सोचे कि क्या शिक्षा कि मंदिर में ये जो सब कुछ हुआ क्या वाही हिंदुस्तान कि शिक्षा पद्धिति का असली रूप है जहाँ छात्रों के साथ ऐसा अमनवीय बर्ताब होता है....
और इस घटना पर में आप से इस लिए राय मंघ रहाहूँ क्यूंकि इस घटना के वक्त में वहां मोजूद था और शनिवार को मैंने इस पर जम कर लिखा तथा इसमे मेरे आगरा के पत्रकार साथियों ने बाखूबी साथ दिया और उन्होंने भी इस घटना कि जम कर निंदा करते हुए हर एक दोषी को कलम और कैमरे से नंगा कर दिया।
में तो इस घटना कि फोयो भी जोड़ना चाह रहा था मगर ये शायद ठीक नही होता क्यूंकि उन्हें देख कर हर कोई उधेलित हो जाएगा

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Thursday, June 18, 2009

वयस्क साक्षरता स्कोर - चीन 93, भारत 66
UNESCO ने मई 2008 में विश्व साक्षरता के नए आँकड़े प्रकाशित किए.किन्हीं फ़्रेडरिक हूबलर ने अपने ब्लॉग पर इन आँकड़ो को दुनिया के नक्शे पर लगाकर दिखाया है. उनके विश्लेषण के अनुसार जिन 145 देशों के लिए आँकड़े उपलब्ध हैं उनमें वयस्क साक्षरता दर का माध्य 81.2% है. वयस्क साक्षरता दर यानी 15 साल या उससे बड़े लोगों की साक्षरता का प्रतिशत. 90% से ऊपर की दर वाले 71 देशों में से अधिकतर योरप, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया, और दक्षिण अमेरिका में हैं. जिन देशों का डाटा उपलब्ध नहीं है वहाँ भी दर 90% से अच्छी ही होने की अपेक्षा है क्योंकि उनमें से अधिकतर विकसित देश हैं. पिछड़े देशों में से लगभग सभी या तो अफ़्रीका में है या दक्षिण एशिया में.सबसे बड़े दो देश चीन और भारत अलग-अलग तस्वीर पेश करते हैं. चीन में जहाँ 93.3% लोग पढ़-लिख सकते हैं, भारत में केवल 66%.आँकड़े ख़ुद अपनी कहानी कहते हैं. पर इन्हें अलग नज़रियों से देखना अक्सर दिलचस्प नतीजे दे जाता है. ऊपर का विश्लेषण समस्या के भौगोलिक वर्गीकरण पर केंद्रित है. अब अगर इन्हीं आँकड़ों को भाषाई नज़रिये से देखा जाए तो देखिये क्या तस्वीर सामने आती है.ये रहे शीर्ष 15 देश, उनका साक्षरता प्रतिशत, और उनकी आधिकारिक भाषाएँ:एस्टोनिया - 99.8 - एस्टोनियन, वोरोलातविया - 99.8 - लातवियन, लातगेलियनक्यूबा - 99.8 - स्पैनिशबेलारूस - 99.7 - बेलारूसी, रूसीलिथुआनिया - 99.7 - लिथुआनियनस्लोवेनिया - 99.7 - स्लोवेनियनउक्रेन - 99.7 - उक्रेनीकज़ाख़िस्तान - 99.6 - कज़ाख़ताजिकिस्तान - 99.6 - ताजिकरूस - 99.5 - रूसीआर्मेनिया - 99.5 - आर्मेनियनतुर्कमेनिस्तान - 99.5 - तुर्कमेनअज़रबैजान - 99.4 - अज़रबैजानियनपोलैंड - 99.3 - पोलिशकिरगिज़स्तान - 99.3 - किरगिज़और अब देखिये साक्षरता दर में नीचे के 20 देश (भारत भी इनमें शामिल है):भारत - 66 - अंग्रेज़ी, हिंदीघाना - 65 - अंग्रेज़ी और स्थानीय भाषाएँगिनी बिसाउ - 64.6 - पुर्तगालीहैती - 62.1 - फ्रांसीसी, हैती क्रिओलयमन - 58.9 - अरबीपापुआ न्यू गिनी - 57.8 - अंग्रेज़ी व 2 अन्यनेपाल - 56.5 - नेपालीमारिशियाना - 55.8 - फ्रांसीसीमोरक्को - 55.6 - फ्रांसीसी, अरबीभूटान - 55.6 - अंग्रेज़ी, जोंग्खालाइबेरिया - 55.5 - अंग्रेज़ीपाकिस्तान - 54.9 - अंग्रेज़ीबांग्लादेश - 53.5 - बांग्लामोज़ाम्बीक़ - 44.4 - पुर्तगालीसेनेगल - 42.6 - फ्रांसीसीबेनिन - 40.5 - फ्रांसीसीसिएरा लियोन - 38.1 - अंग्रेज़ीनाइजर - 30.4 - अंग्रेज़ीबरकीना फ़ासो - 28.7 - फ्रांसीसीमाली - 23.3 - फ्रांसीसीआपको कुछ कहते हैं ये आँकड़े?क्या इनमें यह नहीं दिखता कि निचले अधिकतर देशों में आधिकारिक या शासन की भाषा आम लोगों द्वारा बोले जानी वाली भाषा से अलग (अक्सर औपनिवेशिक) है, जबकि सर्वाधिक साक्षर देशों में शिक्षा का माध्यम और शासन की भाषा वही है जो वहाँ के अधिकतर लोग बोलते हैं?मैं ये नहीं कहता कि सिर्फ़ यही एक कारण होगा या इतना भी कि यही सबसे महत्वपूर्ण कारण है. ऐसा मानना एक गूढ़ समस्या का अतिसरलीकरण होगा. ऐसे कुर्सीविराजित-विश्लेषण (आर्मचेयर एनैलिसिस) में मेरा विश्वास भी नहीं है. पर क्या ये नज़रिया इतना वजनी भी नहीं है कि इस दिशा में कम से कम गंभीरता से सोचा जाए?



हिन्दी ब्लॉग से साभार...........

दोषी कौन है हम या तुम!

एक मशहूर कहावत है-जिनके घर शीशे के होते हैं वे दूसरे के घरों में पत्थर नहीं फेंका करते। लेकिन हम भारतीय अनूठे हैं। हम अपनी ही कही बात पर अमल नहीं करते। ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हो रहे हमले पर भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों ही जगहों पर इसके विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं। नस्लभेदी हमलों पर हर कोई आगबबूला हो रहा है। हर ओर हड़कम्प मचा हुआ है। लेकिन मुझे लगता है कि हमें ऑस्ट्रेलिया को कुछ भी कहने का हक नहीं है। मेरा मकशद ये नही है की हम ग़लत बात पर कुछ न कहे, मगर पहले हमे अपने आप को बदलना होगा महाराष्ट्र में जब उत्तर भारतीयों पर हमले होते हैं तब हम कहाँ होते हैं? "मराठी मानुस" और "भेया" में लड़ाई है नौकरी की। हक की। एक आदमी दूसरे देश या राज्य में पैसा कमाने ज्यादा है इसका कारण होता है उसके खुद के देश में नौकरी व संसाधनों की कमी। या फिर और अधिक पैसा कमाने की लालसा उसे दूसरे देश ले जाती है। इसके अलावा और शायद मुझे और कोई कारण नजर नही आता ।



आप और हम नहीं चाहेंगे कि बांग्लादेश से कोई रूप से आये और हमारा हक हमसे छीने। जब घर में ही दाल-रोटी के लाले पड़े हों तो दूसरे को निवाला कैसे दें? कमोबेश वही हाल विदेशियों का हैं। जब हम हिन्दुस्तान से लोग विदेश में जा कर रहते हैं तब तो सरकार कुछ नहीं करती? महाराष्ट में बिहारियों को ट्रेन में पीटा जाता है, बुरा बर्ताव होता है तब कोई कुछ क्यों नहीं करता? तब हम कहाँ सो रहे होते? तब हर राजनितिक दल अपनी राजनीती की रोटिया सेक रहा होता इसे हम कौन सा "वाद" कहेगा? क्षेत्रवाद? जातिवाद? रंगभेद? हम पूर्वोत्तर राज्यों क्यो भूल जाते है जहाँ के बारे में कोई नही आखिरी बार आपने नागालैंड, मणिपुर, मिज़ोरम आदि की खबर कब सुनी या देखी थी? मुझे तो याद नहीं आ रहा। किस मुँह से किसी विदेशी पर आरोप लगायें जब हम खुद ही एक नहीं हैं? हाल ही में रूसी राजदूत ने कहा कि गोवा में रूसी पर्यटकों से ठीक वैसा ही व्यवहार होता है जैसा कि भारतीयों के साथ ऑस्ट्रेलिया में हो रहा है। ये सुनकर क्या हमें शर्म नहीं आती? क्या भारत की सरकार इस पर चुप्पी साध लेगी?दक्षिण भारतीय और हिन्दी भाषियों के बीच में मनमुटाव कुछ कम नहीं हैं। उत्तर भारतीय के साथ चेन्नई में बुरा बर्ताव हो चुका है। ऐसा नहीं है कि सभी लोग एक जैसे हैं पर असमाजिक तत्वों की कमी भी नहीं।ये तो केवल क्षेत्र की बात करी है। हमारे देश में ऐसे अनगिनत वाद-विवाद मिल जायेंगे। गुर्जर और मीणा विवाद कैसे भूल सकते हैं? यूपी, राजस्थान और बिहार में न जाने ऐसे कितने ही वाद-विवाद रोज़ होते रहते हैं। उनपर हमारा ध्यान कभी नहीं जाता। जब हम स्वयं ही अपने लोगों से उसी तरह से पेश आते हैं जैसे कि ऑस्ट्रेलिया वाले तो हमें कुछ कहने का हक ही नहीं बनता। राज ठाकरे हमारे घर में है विदेश में नहीं। नस्लभेद टिप्पणियाँ कोई नई बात नहीं है। इस तरह के "भेद" हमारे घर में अधिक हैं। पर हम बेशर्म हो चुके हैं।अपने एक मित्र संदीप शर्मा के शब्दों में :यह कहना ग़लत नही होगा की अगर कोई नस्लवाद/जातिवाद की प्रतियोगिता हो तो भारतीय प्रथम आयेंगे ये हमारे अन्दर कूट कूट के भरा हुआ है, वह तो शुक्र है कि भारत एक धनी देश नही है वरना बाकी और देशो के साथ बहुत ही बुरा बर्ताव करता देश से बाहर रह कर भारतीय नस्लवाद और भी स्पष्ट दिखता है वहाँ अगर कोई काला (अफ्रीकी) व्यक्ति दिख जाए तो भारतीय सबसे आगे होते हैं उसका मजाक उडाने में ये इस देश का दुर्भाग्य ही कह लीजिये कि जहाँ भगवान के नाम में भी काले रंग का वर्णन है, उस देश में fairness creams की बिक्री धड़ल्ले से होती है
किसी ने सच ही कहा है :-
अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये,
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये

"माफ़ करना दोस्तों ये बात ही कुछ ऐसी है
की कुछ कर नही सकते और चुप रह नही सकते."
आपका दोस्त अनुज शर्मा