Saturday, March 5, 2011

'भ्रष्टाचार' देश की सबसे बड़ी समस्या

देश की सबसे बड़ी समस्या क्या है? इस प्रश्न पर देशके हर वर्ग के भिन्न-भिन्न होते हैं कोई गरीबी को देश कि समस्या बताता है, तो कोई बेरोजगारी को, तो कोई भूखमरी को
मगर मेरी बात करें तो मेरे विचार से सबसे बड़ी समस्या वह होती है, जिसे लोग समस्या मानना बन्द कर देते हैं और उसे अपने जीवन का एक हिस्सा मान लेते हैं। जैसे खाना खाना, साँस लेना, या फिर सुभाह उठ कर ऑफिस जाना. या फिर कहें तो कोई ऐसे बात जिसके गलत होने का एहसास तो लोगों को है पर उसे सही मानने कि लिए हमने अपने दिमाग को समझा लिया और यह समस्या फिर समस्या ना होकर नियम, कायदा, कानून बन जाता है
और अगर इस प्रकार देखा जाये तो 'भ्रष्टाचार' देश की सबसे बड़ी समस्या है. यह एक ऐसी समस्या है, जिसे हमने न चाहते हुये भी शासन-प्रणाली का और जन-जीवन का एक जरुरी हिस्सा मान लिया है. और आज अब हालात ये हो गए हैं कि लोगों ने इसे समस्या समझना ही बंद कर दिया है। किसी काम को करने के लिए रिश्वत लेना-देना अब नौकरशाही के अनेक नियमों में से एक नियम हो गया है। अब लोग रिश्वत लेने-देने को बुरा नहीं समझते बल्कि जो इस बात का विरोध करता है, उसे बेवकूफ़ और अति आदर्शवादी मान लेते हैं॥ कुछ साल पहले प्रसासनिक सेवा अथवा किसी बड़े पद पर में जाने के इच्छुक लोगों के आदर्श होते थे कि वे देश की बेहतरी के लिये कुछ करेंगे, रिश्वत कभी नहीं लेंगे और अन्य ग़लत तरीकों से पैसे नहीं कमायेंगे।
मगर आज यह आदर्शवादी वर्ग तथा समाज के युवा वर्ग के लिए आदर्श समझे जाने वाले भी " अरे यार आजकल तो सब कुछ चलता है" के अन्दाज़ में बोलने लगे हैं। और इससे ऐसा लगता है कि जैसे सभी लोगों ने अब यह मान लिया है कि अब सरकारी नौकरी करने लोग जाते ही इसीलिये हैं कि कुछ "ऊपरी कमाई" हो सके. आप सोच रहे होंगे मै आज ये बात क्यूँ कर रहा हूँ। इसका एक रिशन है। कल मै जिले के एक बड़े अधिकारी से मिला। जानते हो वह महाशय अपने कनिष्ठ से किसी कम को जल्दी करने के लिए पैसे देकर करने कि सलाह दे रहे थे।
भ्रष्टाचार किस प्रकार देश को घुन की तरह खाये जा रहा है उसका सबसे बड़ा उदाहरण तो हमारे विधायक और सांसद हैं। सभी जानते हैं कि उनको अपने कार्य के लिये कितना वेतन और भत्ता मिलता है? परन्तु देखते ही देखते ही देखते उनके महल खड़े हो जाते हैं, करोड़ों की अचल सम्पत्ति बन जाती है और अच्छा-खासा बैंक बैलेंस जमा हो जाता है. और आश्चर्य की बात तो यह है कि लोग इस विषय में ऐसे बात करते हैं कि जैसे यह एक आम बात हो. जिस जनता ने उनको चुनकर संसद या विधानसभा तक पहुँचाया है, वह तक प्रश्न नहीं करती कि उनके पास इतना धन आया कहाँ से? लोग यह भी नहीं सोचते कि जो पैसा आम जनता से कर के रूप में वसूला जाता है, देश की अवसंरचना के विकास के लिये, उसका न जाने कितना बड़ा हिस्सा तो इन लोक प्रतिनिधियों के जेब में चला जाता है.
दूसरी ओर सरकारी कर्मचारी हैं, जो बिना घूस लिये कोई काम ही नहीं करते. एक ग़रीब आदमी अपना राशनकार्ड भी बनवाने जाता है, तो इन बाबुओं को घूस खिलाना ही पड़ता है. और वह गरीब बेचारा यह सब करता इसलिए है कि यदि वह रिश्वत नहीं देगा तो उससे अधिक पैसा तो दफ़्तर के चक्कर काटने में ही खर्च हो जायेगा. जब उस बाबू से पूछो तो कहेगा कि हमें ऊपर तक पहुँचाना पड़ता है. हद तो तब हो जाती है, जब अधिकारी तो एक तरफ़, कई राज्यों में मुख्यमन्त्रियों तक का प्रत्येक विभाग से निश्चित कोटा होता है, जो क्रमशः नीचे के कर्मचारियों और जनता से वसूला जाता है. यह अब सिस्टम का हिस्सा बन गया है. इस पर किसी को कोई ऐतराज़ ही नहीं होता. लोग यह सोचकर पैसे लेकर जाते हैं कि बिना पैसे के तो काम होना ही नहीं है.
भ्रष्टाचार के इस रोग के कारण हमारे देश का कितना नुकसान हो रहा है, इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है. पर इतना तो साफ़ दिखता है कि सरकार द्वारा चलाई गयी अनेक योजनाओं का लाभ लक्षित समूह तक नहीं पहुँच पाता है. इसके लिये सरकारी मशीनरी के साथ ही साथ जनता भी दोषी है. सूचना के अधिकार का कानून बनने के बाद कुछ संवेदनशील लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध सामने आये हैं, जिससे पहले स्थिति सुधरी है. पर कितने प्रतिशत? यह कहना मुश्किल है. जिस देश में लोगों द्वारा चुने गये प्रतिनिधि ही लोगों का पैसा खाने के लिये तैयार बैठे हों, वहाँ इससे अधिक सुधार कानून द्वारा नहीं हो सकता है.
भ्रष्टाचार से लड़ने के लिये जनता को और अधिक जागरुक बनना होगा और शुरुआत खुद से करनी होगी. बात-बात में सरकार को कोसने से काम नहीं चलेगा. जब हम खुद रिश्वत देने को तैयार रहेंगे तो सरकार क्या कर लेगी? हमें रिश्वत देना बन्द करना होगा, चुनाव के समय अधिक सावधानी बरतनी होगी और समझदारी से काम लेना होगा. हमें हर स्तर पर ग़लत बात का विरोध करना होगा. जब सिविल सोसायटी की जागरुकता से जेसिका लाल और रुचिका जैसी लड़कियों को न्याय मिल सकता है, तो भ्रष्टाचार को अपने देश की शासन-प्रणाली से उखाड़ फेंकना कौन सी बड़ी बात है?हमारे पास मतदान का अधिकार और सूचना के अधिकार जैसे कानून के रूप में हथियार पहले से ही हैं ज़रूरत है तो उस हिम्मत की जिससे हम भ्रष्टाचार रूपी दानव से लड़ सकें.

Wednesday, February 9, 2011

क्यूँकि प्यार तो बस प्यार होता है..

मोहब्बत एक एह्सशों कि पवन कि कहानी है।
कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी हैं।


दिल तथा मोहब्बत की परिभाषा को सरोबर करती ये पंक्तियाँ वास्तव में कुछ ना कहते हुए भी बहुत कुछ कह जाती है। सचमुच प्यार एक ऐसा ही खूबसूरत एहसास है जो सचमुच एक इंसान की जिंदगी बदल देता है। जब किसी को प्यार हो जाता है। क्यूँ कोई पहली ही नज़र मै मन को भा जाता है। क्यूँ उसके पास होने भर के एह्सश जीवन मै खुशियों कि बरसात होने लगती है। जी हाँ शायद इसी को प्यार कहते हैं।
प्यार का यह एहसास इंसान की जिंदगी को खुशियों से सरोबार कर देता है। ऐसा लगता है मानो चारों तरफ फूलों की बहार आ गई है। काँटों से लदे उस पेड़-पौधे पर बढ़ती पत्तियों के साथ प्यार का एहसास एक खिले हुए फूल ‍की तरह दोनों जिंदगियों को अपनी प्यार भरी बारिश से तरबतर कर देती है।

यह जरूरी नहीं है कि आप प्यार का इजहार या प्यार की उस बारिश में एक दिन यानी सिर्फ वेलेंटाइन डे की दिन ही नहाएँ। उसके लिए तो जिंदगी की सारी रातें, सारे दिन, चौबीस घंटे और 365 दिन भी कम होते है। अगर वास्तव में आप किसी को प्यार करते हैं तो हर इंसान के जीवन का हर दिन वेलेंटाइन दिन से कम नहीं होता। अगर वह उसे सही मायने में जिए तो

वेलेंटाइन डे की इस फेहरिश्त में.... सभी शामिल हैं, छोटे-बड़े, भाई-बहन, सास-बहू, पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका हो या फिर ऑफिस में साथ काम करने वाले वे ‍कलिग्स चाहे वे गर्ल हो या बॉय हो या फिर हर कोई वह शख्स जो प्यार की परिभाषा सही मायने में जानता हो। वो सब इस वेलेंटाइन डे को मनाने के सही मायने में हकदार हैं।

ऐसा नहीं है इस दुनिया में सिर्फ चारों तरफ प्यार ही प्यार हो सकता है उसमें लड़ाई-झगड़े, सोच का बदलाव, झूठ-सच की राजनीति सब कुछ जायज है। लेकिन फिर भी प्यार यही कहता है कि प्रेम का अर्थ सिर्फ प्रेम ही होना चाहिए। फिर उसमें भले ही कितनी ही उलझनें, कितनी ही तकलीफें, कितने दु:ख और कितने ही सुख हो फिर सब कुछ वैसा ही चलता रहना चाहिए। उसमें कभी भी‍ ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं होना चाहिए। जब आप दुनिया की हर उस चीज को अपने ही नजरिये से देख पाएँगे।

प्यार को प्यार से और दु:ख, तकलीफ, उलझनों के बी‍च फँसी इस मझँधार रूपी जीवन से जब आप प्यार से जीतोगे तब ही आप प्यार की उस सच्ची पराकाष्ठा को समझ पाएँगे और तभी आपका हर दिन, हर रात वेलेंटाइन की तरह होगी। तब आपको किसी एक खास दिन का नहीं बल्कि तब आपको साल के 365 दिन भी कम पड़ेंगे असली वेलेंटाइन डे का मजा उठाने के लिए।

तो आइए हम इस मुश्किल भरे जीवन से भी एक ऐसी राह निकाल लें जिससे हमें 14 फरवरी का इंतजार ना करना पड़े और हमारा हर दिन ही वेलेंटाइन-सा महसूस हो।



Anuj Sharma
The Pioneer'Hindi'
+91-9897780173